नास्तिकता और गलत साधना दोनों ही मानव जीवन के लिए घातक हैं ।

नास्तिकता :-

नास्तिकता का अर्थ है - किसी भी भगवान को ना मानना और भक्ति साधना को व्यर्थ समझना ।
नास्तिक व्यक्ति मानता है कि कोई भगवान नहीं है । प्रकृति से ये सब अपने आप बनता है और नष्ट होता है । भक्ति साधना व्यर्थ है । आध्यात्मिक को बिल्कुल नहीं मानता है । 


गलत (शास्त्रविरुद्ध) साधना :-

गलत साधना अर्थात् शास्त्रविरुद्ध साधना अपना मनमाना आचरण होता है । जो किसी भी शास्त्र में प्रमाणित नहीं होता है । लोग लोकवेद ( सुनी सुनाई बातों ) के आधार से मनमानी साधना करने लग जाते हैं ।




नास्तिकता और गलत साधना का समाधान :-

नास्तिक लोग ये सोचते हैं कि ये सृष्टि अपने आप बनी है और अपने आप चल रही है, इसका कोई कर्ता नहीं है । 
एक विचारणीय बात है कि जब कोई देश राजा के बिना नहीं चल सकता है तो ये पूरी सृष्टि बिना परमात्मा के कैसे चल सकती हैं ।
वास्तविकता ये है कि परमात्मा ने ही ये सृष्टि रची है और इसको चला रहा है।
 ये लोक गलत हैं, हम दूसरे सनातन परम धाम (शाश्वत स्थान) में रहते थे । जिसका वर्णन गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में हैं । वहा कोई दुःख नहीं है। वहा जन्म - मृत्यु नहीं है । और यहां का मालिक काल भगवान हैं, जो हमें हर तरह से दुखी रखने की कोशिश करता है । और हम ये सोचते हैं कि अगर भगवान हैं तो वो हमें इतना कष्ट क्यों देता हैं । 
और  हम नास्तिक बन जाते हैं ।

लेकिन हम गलत साधना करते हैं इसलिए हमें कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं होता है । गलत साधना अर्थात् शास्त्रविरुद्ध साधना करना भी बिल्कुल व्यर्थ है ।

 क्योंकि गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में कहा है कि अर्जुन ! जो शास्त्र विधि को छोड़कर मनमाना आचरण करते हैं उनको ना कोई सुख प्राप्त होता है, ना गति मिलती है, ना ही कोई सिद्धि प्राप्त होती हैं । अर्थात् व्यर्थ है । 
फिर गीता अध्याय 16 श्लोक 24 में कहा कि इसलिए अर्जुन तेरे लिए कर्तव्य ( जो साधना करनी चाहिए) और अकर्तव्य( जो साधना नहीं करनी चाहिए) की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण हैं किसी की दंतकथा पर विश्वास मत करना । 
इसलिए हमें शास्त्रानुसार साधना करनी हैं, जिससे हमें सभी सुख प्राप्त हो और हमारा मोक्ष भी हो । 
शास्त्रानुसार साधना कौनसी है - 

गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में कहा है कि ऊपर को जड़ वाला, नीचे को शाखा वाला उल्टा लटका हुआ संसार रूपी पीपल का वृक्ष हैं, जो संत इसके सभी भाग भिन्न- भिन्न बता देगा । वो तत्वदर्शी संत हैं । और तत्वदर्शी संत ही परमात्मा की सत्य साधना बताते हैं ।

वो तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज हैं क्योंकि संत रामपाल जी महाराज ने ही इस उल्टे लटके हुए संसार रूपी वृक्ष के सभी भागों को विस्तार से बताया हैं ।  

कबीर, अक्षर पुरुष एक पेड़ हैं, क्षर पुरुष वाकी डार ।
तीनों देवा शाखा है, पात रूप संसार ।।


इसलिए आप इस लोक में भी परमात्मा से पूर्ण लाभ लेना चाहते हैं और मोक्ष प्राप्ति चाहते हैं । तो संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा लेकर शास्त्रानुकूल सत भक्ति करे । 

अधिक जानकारी के लिए पुस्तक डाउनलोड करे...
👇👇
अवश्य देखें प्रतिदिन 👉 साधना टीवी 7:30 PM

Comments